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 16:44 | 11/May/2008 | 0 Comment(s)
PM SEAT and SHOLAY

चुनाव की सुगबुगाहट फिर फ़िज़ाओं में है। कांग्रेस की तरफ से प्रधान मन्त्री के पद के दावेदार के नाम के विषय में एक बार फिर अटकलें लग रहीं हैं।

पिछले चुनाव में आखिरी दिन तक सोनिया जी प्रधान मन्त्री की पद की दावेदार थी। आखिरी क्षणों में उन्होंने तथाकथित महानता का परिचय देते हुये प्रधान मन्त्री की कुर्सी को ठुकरा दिया। इसकी प्रतिक्रिया अलग अलग हलकों में अलग प्रकार की हुई। कांग्रेसियों ने इसे महानतम त्याग की संज्ञा दी। विपक्ष ने कुछ और पहलू रखे। एक जम्हूरे की सोच  इस सन्दर्भ में कुछ इस प्रकार थी।

सोनिया गान्धी के प्रधान मन्त्री पद को अस्वीकार करने के पार्श्व में शोले फिल्म थी। जन्हूरे का  मानना था कि सोनिया जी को प्रधान मन्त्री की कुर्सी कि ओर अग्रसर होते वक्त अचानक शोले फिल्म का एक सीन याद आ गया और उन्होने इस पद को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।

शोले फिल्म में एक सीन है जहां गब्बर सिंह ने वीरु को बान्ध रखा है। बसन्ती भी उसके कब्जे में है। गब्बर बसन्ती से नाचने के लिये कहता है। बसन्ती के मना करने पर गब्बर उसे कहता है कि जब तक तेरी पायल बजेगी, तब तक तेरे यार की सांस चलेगी। और बसन्ती अपने प्रेमी की जान बचाने के लिये नाचने लगती है।

सोनिया जी भी जब प्रधान मन्त्री की कुर्सी की तरफ अग्रसर हो रहीं थीं तो हठात उन्हें इस सीन की याद आ गयी। उन्होंने सोचा कि वहां तो एक गब्बर था यहां तो गब्बरों की पुरी जमात है  और इतने सारे गब्बर यथा लालु, करात आदि के सामने बसन्ती (खुद) की तो क्या कहते हैं की वाट लग जायेगी। बेहतर है कि बसन्ती स्वरुप सरदार मनमोहन सिंह को खड़ा कर दो पायल बजाने के लिये और खुद नेपथ्य में खड़े हो कर सिर्फ चौकस लगाम थामे रखो। बेचारा प्रधानमन्त्री पायल बजाये, नाचे, गब्बर सिंह से बदन नोचवाये और सोनियाजी शासन का proxy में आनन्द भोगें। उसी क्षण उस बेचारे को गरीब की गाय सा डाल दिया भुखे गब्बरों के बीच पायल बजाने को। प्रधानमन्त्री का पद खैरात में पाने का शायद विश्व में यह पहला अवसर होगा।

बाकी कांग्रेस गण भी इस मुद्दे को भली भांति भांप रहे थे। सोनिया जी अगर अन्य किसी राजनीतिक व्यक्ति को प्रधानमन्त्री पद सौंप देती तो नरसिंह राव की भांति वह उन्हें किनारे पर बैठा देता। बेचारे प्रोफेसर मनमोहन सिंह नगरपालिका का चुनाव तक तो जीत नहीं सकते । इस हालत में कदाचित वो सोनिया जी की राजनीतिक यात्रा में कोई आशंका या खतरे की वजह नहीं बन सकते थे। खैर बिल्ली के भाग से छींका टूट भी गया।

आज जब लगभग पांच वर्ष पूरे होने को हैं छींके को टूटे और एक बार राज्याभिषेक की तैयारियां सर पर हैं तो फिर गणतन्त्र का वेताल फिर वही प्रश्न लेकर एक बार फिर  उपस्थित है कि इस बार कौन? भाजपा ने अपनी तरफ से अडवानी जी का नाम आगे बढाया है। दूसरी पार्टी जिसके विषय में भी संभावनायें हैं वह है कांग्रेस। तो अब युवराज का नाम उठना स्वभाविक ही था। नहीं तो पार्टी में फूट पड़ जानी की पूरी तैयारियां हैं। अर्जुन सिंह काफी दिनों से अपने घाव सहला रहे हैं। प्रणब मुखर्जी तो पिछले पच्चीस वर्षों से कतार मे हैं।

तो भाइयों इस जम्हूरे की मानें तो इस बार या तो युवराज को बिगुल फूंक ही देना चाहिये। या फिर चतुर्दिक ऐय्यार दौड़ायें जायें , विज्ञापन छपवावें जायें और फिर कोई नचनिया बसन्ती को खोजा जाये । विज्ञान का मजमून कुछ इस प्रकार को हो। चाहिये है एक नचनिया बसन्ती। जो नाचे और पायल बजाये, गब्बर को रिझाये लेकिन उसके संग रास न रचाये।। तो भाइयों और बहनों ,देशभक्तों और कद्रदानों देश के लिये कुछ करने का वक्त आ गया है। ढुंढिये एक ऐसी बसन्ती प्रधानमन्त्री पद के लिये।

 

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 10:04 | 22/Mar/2008 | 4 Comment(s)
Shabd aur Gabbar

एक समय था

जब मेरे शब्दों में थी

ठाकुर के हाथों सी ताकत

वो उठते तो

समय के ज्वार को

किनारे पर थाम लेते

हर अभिमानी के

अभिमान को

नकेल पकड़ कर

जमींदोज कर देते

और मैं बड़े फ़ख्र से कहा करता

समय,

बहुत ताकत है इनमें

ये शब्दजाल

महज कविता नहीं

फौलाद की जंजीरें हैं।

 

आज परिवार के मोहपाश ने

स्वार्थ के तिमिर ने

व्यवस्था के उत्कोच ने

गब्बर सा काट दिया है

मेरे बाजुओं को

 

मैं बाजुरहित

अवश्य , लेकिन लाचार नहीं

फिर से ढुंढ रहां हूं

गब्बर को

गब्बर ने अब अपना ठिकाना बदल लिया है

वह आजकल रामगढ़ के बीहड़ में नहीं

राजधानी में रहता है।

 

मैं अपनी छोटी सी तूती ले

उतरा हूं

नगाड़ों के कोलाहल के बीच

तूती को

अपनी

आवाज को अन्जाम देने के लिये

आकार या लम्बाई नहीं

वरन

चाहिये होती है

बजाने वाले की

गज़ भर की छाती

और उसके दो गजी फेंफड़ों में

बन्द गर्म हवा।

वो तो है मेरे पास

मुझे नहीं चाहिये

इस सामाजिक व्यवस्था से

कोई भारत रत्न

मुझे अपने परिचय के

मान चिन्ह ढुंढने हैं

स्कूल जाते

एक आदिवासी बच्चे

की मुस्कान में

एक ग्रामीण अबला के

सर पर

सजे स्वाभिमान के

आंचल में

उस वीरु और जय के साहस में

जिसने अब गब्बर के कुत्तों

को रोटी देने से मना कर दिया हो।

 

 

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 12:44 | 21/Feb/2008 | 4 Comment(s)
Raj Thakare and Maharashtra's Respect

राज ठाकरे और महाराष्ट्र की अस्मिता

अस्मिता शब्द साधारणतया तीन अर्थों से जुड़ा है। अहं तत्व, वैयक्तिकता एवं व्यक्तित्व।

किसी भी भू खण्ड की अस्मिता किस से बनती है या बिगड़ती है,इस विषय पर संधान करने की आवश्यकता है। फिर महाराष्ट्र क्या सिर्फ एक भुखण्ड है या एक जन समूह,एक संस्कृति भारतीय संस्कृति का ही एक अंग। किसी भी भुखण्ड की कोई अस्मिता नहीं हो सकती, अस्मिता शब्द सिर्फ जीवन्त व्यस्तु के परिप्रेक्ष्य में ही इस्तेमाल किया जा सकता है।

तो फिर मराठा मानुस की अस्मिता की ही बात की जा सकती है।

मराठा मानुस की पहचान क्या है। और क्यों उसकी अस्मिता खतरे में है। सरकारी प्रावधानों के तहत 12 वर्षों में कोइ भी व्यक्ति भारत के किसी भी प्रान्त में बस कर वहां का वाशिन्दा( domicile) सहज ही हो सकता है। हमारे संविधान की मूलभुत धारणा और उसक्र तहत धारा 19 में किसी भी भारतीय को व्यापार के साथ साथ यात्रा की पूरी स्वतंत्रता है। यानि संविधान तोड़ कर , एक वृहत हिंसात्मक आन्दोलन द्वारा  अस्मिता की रक्षा की पक्रिया  Frankestein या भश्मासुर पैदा करने का भयानक प्रयास है।

और फिर अगर बिहारियों के सूर्य नमस्कार करने से महाराष्ट्रियों की अस्मिता को धक्का पहुँचता है, तो यह महाराष्ट्रियों के लिये अत्यन्त शर्मनाक बात है।

महाराष्ट्र में से अगर मुम्बई को निकाल दिया जाये तो महाराष्ट्र एक खोखला ढांचा रह जाएगा। मुम्बई को मुम्बई या कुबेर नगरी बनाने का सारा श्रेय सिर्फ मराठी भाषी व्यक्तियों को नहीं है। भारत वर्ष में अधिकांश बड़े उद्योगपति घरानों के मुख्यालय मुम्बई में है। इनके कारखाने तो मुम्बई या अक्सर महाराष्ट्र के भी बाहर होते हैं। उदाहरणस्वरुप रिलायंस इंडस्ट्रीज का कारखाना तो जामनगर या गुजरात में है,लेकिन मुख्यालय मुम्बई में है। अतएव इन्कम टैक्स व आत्पाद शुल्क तो मुम्बई के खाते में ही जमा हो जाते है। इसी तरह के ढेर सारे अन्य Corporate  घरानों के मुख्यालाय भी मुम्बई में हैं। और वे भी अपना आयकर वहां जमा करा कर मुम्बई की अर्थ व्यवस्था के विकास में अपना योगदान देते हैं। अधिकांशतः इन घरानों के मालिक गैर मराठी भाषी समाज से आते हैं। मुम्बई का पूरा फिल्म उद्योग हिन्दी भाषा सेवी है न कि मराठी का। राज ठाकरे के कथनानुसार तो इन सारे उद्योगों को अपना बोरिया बिस्तर मुम्बई से समेट कर और कहीं प्रस्थान कर देना चाहिये। और सिक्के के दूसरे पहलू के अनुसार सारे मराठी भाषियों हिन्दुस्तान या हिन्दुस्तान के बाहर कहीं भी हों उन्हें महाराष्ट्र के लिये कूच कर देना चाहिये। मैं एक उत्तर भारतीय हूं और पूर्वी भारत में रहता हूं। जिस तरह राज ठाकरे को बिहारियों के छठ पर्व पर आपत्ति है,उसी तरह कल मुझे भी दिवाली मनाने से प्रतिबन्धित किया जा सकता है। सरकार की जिम्मेदारी है कि ऐसी सोच को पैदा होने के पहले ही दबा दिया जाये। ऐसी ही विघटनकारी सोच ने प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात योरोप में balkansition की प्रक्रिया कर कई देशों के टुकड़े टुकड़े कर दिये थे।  ।आज उसी विघटन के संशोधन हेतू EEC और ECM की परिकल्पना की गयी है। हाल में सोवियत संघ के दस टुकड़े होने की वजह भी प्रान्तीय भाषाई अहं व भेद ही है । जहां पूर्व एवं पश्चिम जर्मनी तमाम विषमताओं के बावजूद एक हो गये वहीं राज जैसे विघटन कारी व्यक्ति भारत जिसकी पृष्ठभुमि जननी जन्म्भुमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि की है, का एक और विभाजन करवाना चहते हैं। अंग्रेजों ने divide and rule के तहत दो टुकड़े किये ये घटिया राजनीतिज्ञ पता नहीं कितने टुकड़े कर कर दम लेंगे। जिस तरह उद्धव ने भी इस सोच को हवा दी है, यह एक अत्यन्त खतरनाक परीस्थिति को पैदा करने की क्षमता रखता है। हमें बहुत जल्द balkanisation या विघटन का सामना करना पड़ना सकता है। यह एक अत्यन्त संकुचित सोच व अपराधिक प्रवृत्ति का परिचय है।

अस्मिता या व्यक्तित्व की उंचाई स्वयं अपने कद में उंचाई प्राप्त कर की जा सकती है न कि किसी अन्य को कुचल कर। यह एक भ्रामक व पतनोन्मुखी मनोदशा है। हिटलर ने यहूदियों को मार कर अपनी वर्चस्वता या आर्य जाति की अस्मिता हासिल करने का प्रयास किया था। हस्र सभी जानते हैं। किन्तु ऐसे आन्दोलनों में भीषण आग लगाने की शक्ति होती है। इस सोच का तुरन्त दलन अति आवश्यक है। वर्ना यह आसाम,महाराष्ट्र होते हुये कहां कहां पहुंचेगा और कितनी भयावह स्थिति पैदा कर देगा कुछ कहा नहीं जा सकता। गृह युद्ध कुछ ऐसी ही सरकारी उदासीनता एवं समझौते करण के कारण पैदा होते हैं।    

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 15:00 | 17/Feb/2008 | 1 Comment(s)
Laptop

आज नई इजादों के साथ साथ हिन्दी में काफी नये शब्दों की आवश्यकता महसूस हो रही जैसे:

 

Mobile or Cellphone= सुभाष (संकलित)

Laptop= उर्वषी (स्वरचित) Lap=उर्वा

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 10:58 | 26/Jan/2008 | 6 Comment(s)
VIDEH

विदेह*

हाँ

अब मैं विदेह हो गया हूं

आज के पहले

देह में आत्मा का होना

एक पीड़ा दायक स्थिति थी

हर उचित व अनुचित कृत्य

आत्मा के रास्ते से होते हुये

देह पर कुछ न कुछ

पदचिन्ह छोड़ जाते थे।

इनका बिम्ब मेरे व्यक्तित्व

पर निरन्तर हावी रहता

कभी कदम डगमगाते

कभी अपराध बोध से

मन सिहर जाता

अब आत्मा का देह से विच्छेद

काफी सकून मय है

यावम जीवेत

सूखम जीवेत

को पाथेय मान

अपनी आत्मा को लौकर में बन्द कर

अब मैं बहूत खुश हूं

अपने अधोपतन से निःस्पृह

आत्मा नहीं, मेरी देह

अब चिरयुवा

एवं नैनं दहति पावकः हो गयी है।

सारी यातनायें भोगती

लौकर में बन्द आत्मा

छिन्दन्ति शस्त्राणि हो

नित्य ही लहू लुहान हो रही है।

मेरे जीवन के वृत्त की धूरी

अब सिर्फ मैं ही हूं

अब मेरे किसी कृत्य की छाया

मेरे शरीर या व्यक्तित्व

को छू नहीं पाती।

क्योंकि उसको मुझतक पहुंचाने का सेतु

मेरी आत्मा

तो अब लौकर मे बन्द है।

सारे क्लेश आत्मा तक पहुंच

वहीं रह जाते हैं।

और चिरयुवा मैं,

सुख की नींद सो पाता हूं

क्योकिं मेरा और मेरी आत्मा का

अब सन्धि विच्छेद हो चुका है

और मुझ विदेह को ।

दुनिया, सफल व्यक्ति मान

राम रत्न से भी उच्च

भारत रत्न से सम्मनित करने को इच्छुक है।

विदेह= जनक का एक और नाम

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 08:44 | 24/Dec/2007 | 2 Comment(s)
Gujarat II (pl read part 1 published below before reading this blog)

If any problem read here. http://kuldipgupta.blogspot.com/

कामरेड नमो से मुखतिब: चुनाव आयोग ने आपको सिर्फ चेतावनी दे कर छोड दिया। लेकिन आपका जुर्म काफी संगीन था। आपका prosecution होना चाहिये था। आपने हत्या को जायज ठहराया था।

नमो: मुझे आपकी इस बात पर हसी आती है। आपलोगों ने तो हमेशा ही सक्रिय हिंसा को अपने स्वार्थ के लिये व्यवहार किया है। हाल ही में नन्दीग्राम और उसके अलावा मार्क्सवाद का तो नारा ही रहा है कि POWER FLOWS FROM THE BARELL OF A GUN. भारत में जाँत पाँत और उसके साथ संलग्न हिंसा तो राजनीति का एक सहज आवश्यक अंग रही है। कब किस दल ने हिंसा को अपरिहार्य माना है।

कामरेड: आपने मँच से इसको स्वीकार कर एक अक्षभ्य काम किया है। ये सारे कृत्य रात के अंधेरे एवं चोरी छिपे किये गये कृत्यों में स्थान पाते हैं। अन्य किसी भी दल ने इसे कभी आपकी तरह स्वीकार नहीं किया है। भारतीय राजनीति के कुछ unwritten laws हैं, जिनके तहत हिंसा की भर्त्सना आवश्यक है।

नमो: ये सारे नियम अब बदल रहें हैं। हमने कानुन का शासन काफी सह लिया। अब हमें करवट बदलने की आवश्यकता है। हिन्दुओं में जागृति लाने के लिये उन्हें हिंसा की ओर मोड़ना आवश्यक है। और ये काम नेहुरे नेहुरे नहीं हो सकता। इसीलिये मँच से हमें हिंसा का उद्घोष जरूरी था।

मादाम: राजीव गांधी ने सन 1984 में जब कहा था कि पेड़ गिरने से धरती हिलती है। हमने भी हमारे द्वारा की हुई हिंसा को हमेशा स्वीकार्य कृत्य ही माना है।

मादाम:चुनाव में हिंसा का महत्व है। इसीलिये हमने भी ढेर सारे अपराधी और संगीन अपराधियों को हमेशा चुनावी उम्मीदवार बमाया है। भाई कामरेड तुम और हिंसा से परहेज ? परम पाखँडी हो तुमलोग । इस पाखड पर कम से कम अब नन्दीग्राम के बाद तो बाज आओ।

कामरेड: ळेकिन ये तो कानून के विरुद्ध है। किसी भी प्रकार की हिंसा फैलाना कानूनी अपराध है। और इसीलिये आजतक ये सारे काम हम चोरी छिपे ही करते आ रहें हैं।

नमो: कामरेड पाखँड में तो आपलोगों को स्वर्ण पदक पाने का हक है। आप secular वाद का दम भरने वाले, नस्लीमा को बाहर निकाल देते हैं क्योंकि कुछ असामाजिक तत्व उसे नहीं चाहते हैं। हमने तो उसे तुरन्त शरण मुहैया करवाई है।

मादाम: भइ आज की शाम गुजरात चुनाव के नाम है। इधर उधर के नस्लीमा जैसे विषय उठा कर शाम का स्वाद मत बिगाड़ो।

नमो महोदय: मादाम आप अब भी हमारी बात मान लीजिये।इन कामरेडों के चक्रव्यहू से बाहर आकर हमारे साथ हाथ मिला लीजिये इसीमे आपका भला है।

मादाम: यह क्या मैं नहीं समझती। इन कामरेडों के भरोसे तो सिर्फ दो प्रान्तों में ही झंडा फहराया जा सकता है।

और फिर ये सरकार से बाहर रह कर सिर्फ खटमल की भुमिका ही निभाते रहते हैं। खटिया में करने धरने को कुछ नहीं, सिर्फ गाहे बेगाहे काटना ही इनका कुल योगदान है।

लेकिन आपके साथ आने से एक बहुत बड़ा खतरा है कि आपका cadre और संगठन हमें कुछ ही समय में लील जायेगा। हमारी यह 120 वर्ष पुरानी पार्टी खत्म हो जायेगी।

नमो: मादाम आप किस पार्टी की बात कर रहीं हैं। 120 वर्ष पुरानी पार्टी तो कब की मर खप चुकी है। वह तो सन 1947 में ही समाधिस्थ हो गई थी।  सन 1969 में एक नयी पार्टी इन्दिरा कंग्रेस ने जन्म लिया था। वह पार्टी भी कमोबेश सन 1984 में खत्म हो गयी। आज जिस पार्टी की आप managing director हैं वह तो एक सर्वथा नई पार्टी है। आज आपकी पार्टी में या अन्य किसी भी पार्टी में फर्क ही क्या है। Party Manifesto तो कभी कोई पढ़ता ही नही है। क्रिया कलाप तो सबके वहीं हैं,यथा टका धर्मः, टका कर्मः। तब पार्टी का नाम कुछ भी हो क्या फर्क पड़ता है।

मादाम: लेकिन धर्म निरपेक्षता का क्या होगा। आपलोग तो मुस्लिम के नाम से चिढ़ते हैं। उन्हें बाबर की औलाद कहत&#