बरगद का पेड़
( a poem written by me when i was 20 abt 34 years back)
बरगद का पेड़ तो बूढा ही पैदा हुआ था
वह सदा झुका रहा है
हथेलियां जमीं पर टिकी रहीं
सूरज के ताप से झुलसता
ताउम्र चौपाये सा पीठ झुकाये खड़ा रहा
वह नासमझ समझता था कि
सूर्य की किरणें तो जीवनदायिनी हैं।
एक दिन हठात्
उसकी मुलाकात हुई
हकीम शफाखाना से
साथ में थी खोयी हुई जवानी
वापस दिलाने का वादा।
उसके वादे से आश्वस्त
जैसे ही हथेलियां जमीन से उठाईं
वह ह्हरहरा कर ढ़ेर हो गया।
वह भूल गया था कि
उसने तो जवानी कभी खोई ही नहीं थी
वह तो बुढ़ा ही पैदा हुआ था
वह यह भी नहीं जानता था कि
खुद हकीम भी सूरजमुखी ही था
और माँ पृथ्वी
निःस्पन्द थी
क्योंकि बेटा कमाउं नहीं था