नई सदी कुछ सनातन प्रश्न
लेखक का मुख्य कर्तव्य प्रश्न करना है। अक्सर ये वही प्रश्न होते हैं, जो लोगों के मानस को पहले से ही झकझोरते रहते हैं। लेकिन आमतौर से लोग अपनी कमजोरियों से बद्ध इन प्रश्नों कों कभी पुछ्ते नहीं है। लेखक उन प्रश्नों के उत्तर सुझाता तो है, लेकिन उसके सारे उत्तर अधूरे ही होते हैं। उन अधूरे उत्तरों से पाठकों को कुछ आनन्द मिलता है तो कुछ झुंझलाहट भी होती है। यही झुंझलाहट पाठ्कों को अपने आप से प्रश्न पूछ्ने के लिए मजबूर कर देती है। लेखक का ध्येय भी, उत्तर देना नहीं है, वरन उत्तर ढुंढने की इच्छाशक्ति जगाना है। समुचित उत्तर कभी बाहर से नहीं आते उन्हें अपने अन्दर ही ढुंढुना पड़ता है। आजतक मानव इतिहास में सम्पूर्ण उत्तर तो सिर्फ श्री क्रृष्ण ही दे पाये थे। आज मैं भी पाठकों से कुछ प्रश्न पूछ्ने का दुःसाहस कर रहा हूँ।
1) इक्कीसवीं सदी में धर्म की प्रासंगिकता क्या है ?
2) क्या an eye for an eye ही उचित न्याय है।
3) क्या भगवान सिर्फ मन्दिर में ही बसते हैं।
इक्कीसवीं सदी में धर्म की प्रासंगिकता क्या है- काफ़ी समय से तकरीबन पूरे विश्व में ritualistic religion की ही प्रमुखता रही थी। हांलाकि भारत में अपवाद स्वरुप
वेदान्तिक या मानववादी विचारधारा कभी भी गौण नहीं हुई।लेकिन योरोप में भी विगत दो शताब्दियों से ह्युमानिस्म विचारधारा को काफ़ी सम्मान मिला है। थियोसोफिकल सोसायटी (अमेरिका) का भी मूल वाक्य है कि “कोई भी धर्म ,सत्य से उँचा नहीं है। समाज में जब कभी कर्मकाण्ड (rituals) के प्रति आस्था कम हुई तव मानवतावाद नें अपनी जड़ें मजवूत की है।
हमारे तथाकथित धर्मगुरुओं की एक वड़ी विड़म्बना रही है कि अक्सर या तो उन्होंने समाज से विमुख हो अपने आपको आश्रमों या कन्दराओं में कैद कर लिया है , या तुलसीदास की उक्ति समर्थ को नहीं दोष गुसाई को चरितार्थ करते हुए विजयी शक्तियों का साथ दिया है।
समाज से विमुख आश्रमवासी सन्त, भक्तिभाव भले ही जगा पायें किन्तु कर्मरहित हो अपनी सार्थकता खो देते हैं। कर्मयोग के सूत्र में ही भक्तियोग व ज्ञानयोग के माणिक
पिरो एक ग्रहणीय माला बन सकती है। ये माणिक अलग अलग चाहे कितने भी खुवसुरत दिखें लेकिन आभुषण नहीं बन सकते।
इतिहास के अधिकांश नाजुक मोड़ों पर धर्मगुरुओं ने औचित्य को दर किनारे कर, समर्थ का साथ दिया है। स्पेन में गणतन्त्र की हत्या करने वाले जनरल फ़्रेंको
को चर्च ने उच्चस्तरीय सम्मान से नवाज़ा ,मुसोलिनि जैसे फासिस्ट को द्वितीय विश्व
युद्ध के पहले पोप ने स्वयम प्रभु पुत्र का नाम दिया।
कहीं कहीं धर्मगुरुओं ने ग्रन्थों को विचारशीलता से अधिक महत्व दिया है। यह स्वार्थपरक एवम दिग्भ्रमित प्रकिया है। मनुष्य एक बुद्धिशील अभिव्यक्ति है।
कुछ जानने की, कुछ नया समझने की इच्छा रखता है। एक छोटे बालक की अंकों के पहाड़े के प्रति जिज्ञासा किसी भी revealed truth से अधिक महत्वपूर्ण है,क्योंकि उसमें मनुष्यता का पहला परिचय, एक स्वतन्त्र सोच एक सहज जिज्ञासा छिपी है। आदि शंकराचार्य ने व्रह्म भाष्य लिखते वक्त पहला वाक्य लिखा, आओ व्रह्म के प्रति जिज्ञासा करें। जिज्ञासा से परे का धर्म इक्कीसवीं सदी मे अप्रसांगिक है।
किसी भूखण्ड को राष्ट्र बनने के लिये महज आर्थिक व राजनीतिक सामंजस्यता के परे एक वैचारिक एकरसता एवम सामन्वयिक चिन्तन की भी परम आवश्यकता है। भारत की विशाल आबादी की पृष्ठभुमि में अनेकता होते हुए भी विचारों एवम संस्कृति का आम सहज धरातल ही इस राष्ट्र को बाँधे हुए है।
नीत्से स्वरुप ईश्वर की हत्या कर पाश्चात्य समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी जड़ों से उखड़ अधार-रहित हो गया है।
कार्ल युंग (मनोचिकित्सक) ने कहा है कि उसके वे सारे मरीज जिन्होंने क्रिश्चियनिटि की शरण ली, ठीक हो गये ओर जिन लोगों ने धर्म को अप्रासंगिक माना, वे रोग मुक्त नहीं हो पाये। यानि एक सक्रिय एवम संपुष्ट मानस के लिये धर्म का सहज धरातल नितान्त आवश्यक है।
2) क्या an eye for an eye ही उचित न्याय है।
गाँधीजी ने कहा था कि an eye for an eye would leave the whole world blind.
गाँधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ़ भारत छोडो आन्दोलन छेडते हुए कहा था कि आज जब मैं अपने जीवन क सबसे बडा युद्ध अंग्रेजों के खिलाफ़ छेड रहा हूँ, मेरे मन में उनके लिये किंचित मात्र भी द्वेष नहीं रहना चाहिये। आज अंग्रेज क्रोध के क्षणों में हमें हिंसा के लिये प्रोत्साहित कर सकते हैं। लेकिन किसी भी परिस्थिति में हमें अपना धैर्य नहीं खोना है। मनुष्य ओर उसके कृत्य दो भिन्न संज्ञायें हैं। घृणा व्यक्ति के कृत्य से होनी चाहिये व्यक्ति से नहीं। गोधरा में जो कुछ घटा एक अत्यन्त घृणित एंव नृशंस कृत्य था लेकिन उसके प्रत्युत्तर में जो कुछ घटा वह भी उसी सिक्के का दूसरा पहलु है। एक शक्तिशाली व अनुशासित समाज का परिचय पत्र अहिंसा है,हिंसा नहीं।
3) क्या भगवान मन्दिर में बसते हैं।
इसके उत्तर में कविगुरु श्री रविन्द्र नाथ ठाकुर ने गीताँजली में कहा था कि अन्धेरे मन्दिर में बन्द दरवाजे के पीछे किस की आराधना कर रहे हो। प्रभु वहां नहीं हैं। वे तो किसान के साथ पसीने में तर बतर खेत में खड़े हैं, रास्ता बनाने वाले मजदुर के साथ सड़क पर पत्थर तोड़ रहे है। तुम भी धूप-तस्बीह त्याग, धूल गर्द में उतर आओ,तब ही उसको पा पाओगे। आज पार्थसारथी वाला रुप मुरलीवाले रुप से अधिक प्रासंगिक है। गीतानुसार कर्म ही धर्म है अतएव कर्मभुमि ही पावन अर्चना-स्थल है। पण्डित नेहरू ने भी उड़ीसा में हीराकुड बाँध के उद्घाटन के समय कहा था कि ये उद्योग ही हैं, आजके तीर्थ स्थल।
ओर फिर मन्दिर की परिभाषा क्या है? हर वह स्थल जहां शान्ति हो, एक ऐसा वातावरण जहां व्यक्ति स्वयम से अभिसार कर सके, वह स्थल ही मन्दिर है। यह उसका अपना ह्रदय हो सकता है, आपका घर हो सकता है, इसके लिये किसी मुर्ति का उस के में होना या न होना अप्रसांगिक है।
भगवान तो घट-घट के वासी हैं। इनका प्रिय निवास स्थान भक्तों का वक्षस्थल है। प्रभु के निवास स्थान के लिये किसी ऊँची या भव्य इमारत की कोई आवश्यकता नहीं है।
पाश्चात्य लेखक Ludwig Feurbach ने भी भगवान को मानव से अलग या परे मानने से इन्कार किया है।वेदान्त का तो मूलमन्त्र ही है “अहम् ब्रह्माश्मि” और “शिवोहम्”।
जब हर व्यक्ति ब्रह्म की ही आंशिक अभिव्यक्ति है, तब भगवान का निवास तो हर घर में है।जब ईश का ही रुप, मनुष्य के स्वरुप से बड़ा या पृथक कदाचित सम्भव नहीं है तब मन्दिर का आकार प्रभु के आकार से बड़ा कैसा हो सकता है।
वेदान्तिक सोच में मनुष्य ही सर्वोपरि है।मानव सेवा ही माधव सेवा है।मैं एक कट्टर हिन्दु हूँ। कुछ लोगों को इन संवादों में अनास्था की बू आ सकती है। हिन्दुत्व के चश्मे से नास्तिक सिर्फ वे लोग हैं जिन्हें खुद पर आस्था नहीं हैं, अन्य सारे लोग आस्तिक हैं।इन नास्तिक लोगों ने ही कुछ मूर्तियां कुछ मिथ्याचिन्ह खड़े कर मनुष्य को मनुष्य से अलग किया है।
धर्म का मुख्य परिचय लोगों को एक दूसरे से जोड़ने के प्रयास का है। लेकिन इसके विपरीत मन्दिर मस्जिद भेद कराते का पद ही आज की हकीकत है।
मैं मन्दिर या मूर्ति पुजा का विरोधी कतई नहीं हूँ। मेरा यह मानना है कि मूर्तियां स्वचालित वाहन (CAR) की बैटरी के सदृश पहले हमारी अर्चना,आस्था से ऊर्जा संग्रहित करती हैं, तत्पश्चात अन्धेरे के समय उसी ऊर्जा को प्रकाश में तदबील कर हमारा मार्ग प्रशस्त करती हैं हमारी शिथिलावस्था में हमारे self starter को गति देती हैं।
मन्दिरों की भी एक परम्परा हैं। जहाँ भी महान आत्माओं ने दीर्ध काल के लिये निवास किया है, उन स्थलों की मिट्टी में उनके सुवास उनके विचार रस बस जाते हैं। चारों धाम के मन्दिरों में आदि शंकराचार्य के प्रमुख विचारों की छाया झलकती है।
मन्दिरों ने अनेक भटके हुओं को प्रभु के मार्ग का दिशासंकेत दिया है।
लेकिन प्रभु की भक्ति किसी अर्चनास्थल की मुखापेक्षी नहीं है। भक्ति की परम ऊंचाईयों उदघोष कबीर के इन दोहों “जब तक एकम एक न सोवे, तब तक कैसा सनेह “या” मैं राम की बहुरिया” में जैसा पराकाष्टित होता है, वैसा अन्य शायद ही कहीं ओर मिले।
जयदेव के गीत-गोविन्द में राधा कृष्ण का प्रणय या आत्मा का परमात्मा में विलय में मन्दिर की कहीं कोई भुमिका नहीं है। यहां पलाश के पत्तों पर बसन्त कुंज के अन्धेरे में भी भक्ति का समर्पण भाव किसी भी मन्दिर के प्रांगण में से अधिक गहन है।
मन्दिर मस्जिद काबा या मूर्त्ति उस सार्वभौमिक शक्ति के प्रतीक चिन्ह मात्र हैं। विडम्बना है कि हमने अन्धविश्वास वश इन प्रतीकों को ही प्रभु मान लिया है। मूक प्रतिकों से मुखर तथ्यों की यात्रा तय करने के लिये आवश्यक है कि हम इनके बीच की दुरी पहचानें। कबीर का ही एक ओर कथन है “ना मैं काशी में, ना मैं मगहर में,
ना मैं काबा कैलाश में”
मैं समझ रहा हूँ कि मेरे सारे संवाद अधुरे हैं। आनन्द अधुरे से पूर्णता के प्रयाण में है, पूणर्ता के अन्वेषण में है, सत्य की खोज में है। philosophy शब्द प्रोटोगोरस नामक ग्रीक विचारक ने ईजाद किया था। उसने इस शब्द को परिभाषित करते हुए कहा था
Philosophy is the logical quest for thruth.
हर व्यक्ति को उत्तर अपने ही हैं। असदो मा सद गमय:। quest is more enticing then the realisation. यात्रा भी गन्तव्य से अधिक मनोहारी है।