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Wednesday 14 May, 2008
 19:04 | 16/Dec/2007 |  4 Comment(s)
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कुछ खबरें और उनका व्याकरण

हाल की ताजा खबर है कि दिल्ली के नजदीक एक अभिजात्य विद्यालय के आठवीं कक्षा के दो छात्रों ने अपने एक सहपाठी की विद्यालय में गोली मार कर हत्या कर दी। इस खबर को भारत के सारे समाचार पत्रों ने बडी प्रमुखता के साथ छापा है। भारतवर्ष के परिप्रेक्ष्य मे निःस्सन्देह एक चौंका देने वाली खबर है। इस खबर के सन्दर्भ में इसका व्याकरण तलाशने की आवश्यकता है।

अमेरीका से ऐसी खबरें पहले भी आती रहीं हैं। लेकिन आज भारत में ऐसी खबरों की उत्पत्ति के विश्लेषण की परम आवश्यकता है। भारत में दिल्ली ही ऐसी सोच का स्वाभाविक प्रवेशद्वार हो सकता है। यहां एक खास किस्म की सोच समाज में घर कर गयी है। जो चल सकता है वह सही है। कानून की बन्दिशें सिर्फ मूर्ख और कमजोर व्यक्तियों के हिस्से में आती हैं। पहुंच और रुतबे वाले लोगों के लिये कानूनी बाधायें कुछ मायने नहीं रखती हैं। और सबसे अधिक जो विकृत सोच है वह यह है कि टका धर्मः,टका कर्मः । आर्थिक शक्ति ही जिन्दगी की एक मात्र barometer है। नीरद चौधरी ने दिल्ली के विषय में लिखते हुए ही कहा था कि "The only culture they have is agriculture". संस्कृति से विमुख हो समाज में जो विकृतियाँ स्वाभाविक हैं, वे ही यहां दृष्टिगोचर हैं।

आइये इस समाचार के विभिन्न पहलुओं पर गौर करें उनका विश्लेषण करें एव तत्पश्चात उनसे संलग्न सामाजिक विषंगतियों पर विचार करें।

एक सरकारी कर्मचारी अपना लाइसेंस शुदा रिवाल्वर अपने मित्र के हांथों सौंप देता है। यह जानते हुए भी की यह एक संगीन जुर्म है।

एक तथाकथित सम्भ्रान्त परिवार (Property dealer) में अवैध रुप से प्राप्त किया हुआ हथियार, सहजता एव लापरवाही के साथ रखा हुआ है।

उस छोटे 14 वर्षीय बालक को उसके ही पिता ने खेल खेल में उसे रिवाल्वर जैसे खतरनाक हथियार से वाकिफ़ करवाया है।

एक 14 वर्षीय बालक इतना असहिष्णु और आत्मपरक है कि आम परेशानियां के निदान हेतु जान ले लेना उसके लिये उचित निदान है।

इन सब घटनाओं से पहली बात जो उभर कर आती है कि परिवार के अन्दर शिक्षा का अभाव एव अर्थ का बाहुल्य है। दिल्ली में जमीनों कि कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि होने से Property dealers की एक पूरी जमात खड़ी हो गयी है। प्रायः इस वर्ग में अधिकांशतः शिक्षा के प्रति गहन उदासीनता एवं भैंस (शक्ति या पंहुच) का अक्ल से बड़ा होना माना जाता है। कुछ समय पहले एक छोले भटुरे वाले की हजार करोड़ की जमीन एव प्लाटों की मिल्कीयत की खबर भी इसी समाज से उभर कर आती है। दिल्ली का राष्ट्रीय राजधानी होना इन सब का मुख्य हेतू है। राजधानी होने से बड़े राजनेताओं का निवास एव उनकी उपस्थिति वहां एक विशेष Power Center का निर्माण करती है। और जो लोग इस Power Center की परिधी में आ पाते हैं उनके लिये कानून का कोइ अर्थ नहीं रह जाता। यह भारत की चिर परीचित सामन्तवादी सोच का सहज उपसंहार है।

सामाजिक हिंसा का सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं है। सभ्यता के प्रथम लक्षण हैं कि आपसी मतभेदों का समाधान बिना हिंसा व आक्रमकता से किया जाये। शिक्षा का भी प्रथम कर्तव्य सभ्यता के इसी पहले सोपान से शुरू होता है ।

हर विषय के विश्लेषण के लिये उसका व्याकरण और सन्दर्भ समझना अति आवश्यक है। इस समाचार के व्याकरण में कहीं न कहीं एक गहन समजिक विद्रुपता छिपी है।

इस समाचार का व्याकरण तो कमोबेश उपरोक्त पंक्तियां परिभाषित कर ही देती हैं। बढता हुआ उपभोक्तावाद और अशिक्षा इस प्रकरण को जमीन प्रदान करते है।

आज आवश्यकता है कि समाज का जागरुक चतुर्थ स्तम्भ इस समस्या एवं संलग्न विंसंगति पर एक गहन चिन्तन कर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेडें ।

मैं इस समाचार के पीछे छिपे एक बडे रोग के symptoms को सहज ही देख पा रहा हूं। यह समाचार संवेदनशीलता और जीवनमुल्यों के ह्रास का विशेष द्योतक हैं। जब व्यक्ति पूर्णतया आत्मपरक हो जाये और समाज से सिर्फ स्वार्थ का नाता हो तब पाश्चात्य उपभोक्तावाद ही एक मात्र मूलमत्र हो जाता है। स्वकेन्द्रित व्यक्ति के पास जीवनमूल्यों के लिये कोइ स्थान नहीं रहता। मनुष्य और पशु का भेद है विवेक का। ऐसे व्यक्ति में विवेक के नाम पर सिर्फ चातुर्य बच जाता है और सघर्ष के नाम पर महज अर्थोपार्जन की कशमकश। व्यक्ति उसकी अभिव्यक्ति से इतर हो सिर्फ अपने शरीर में स्थापित हो कर रह जाता है।

परिवार जीवनमुल्यों के प्रति सजगता की प्रमुख पाठशाला है। उपभोक्तावाद ने संवेदनशीलता और चैतन्य भाव की नींव को ही हिला दिया है। जब जीवन मे मैं सर्वोपरि हो जाता है तब mary pompedour का संवाद "be there deluge after me" वसुधैव कुटुम्बकम का पर्याय हो जाता है।

अमेरीका मे सत्तर के दशक मे एक पुस्तक प्रकाशित हुइ थी," IF I AM OK ,YOU ARE OK" यह सम्पूर्ण रुप से उपभोक्तावाद की सहज स्वीकृति थी। इसका परिणाम वही अपेक्षित है,जो आज अमेरीका में प्रतिदिन घट रहा है।

ये सारे प्रकरण कहीं न कहीं उपभोक्तावाद के साथ गहराई के साथ जुडे हुए हैं। गहन उपभोक्तावाद संवेदनशीलता का हन्ता है। शिक्षा अपने मूल ध्येय से विमुख हो सिर्फ जीविकोपार्जन का साधन बन गयी है। शिक्षा का मूल उद्देश्य था व्यक्ति के अन्दर का उसके बहिरंग के साथ सामंजस्य पैदा करना एव निर्भयता प्रदान करना। व्यक्ति को एक विचारशील अभिव्यक्ति में परिवर्तित करना। आज शिक्षा पूरी तरह अपने उस ध्येय से परे हो गयी है। इस अधूरी शिक्षा में महत्व सिर्फ सूचनायें एव किताबी ज्ञान का संकलन भर का है। विद्वता के लिये आवश्यक है उन सूचनाओं को विचारों में परिवर्तित करने का। इसी से शिक्षा व्यावाहारिक हो विद्वता में तद्बील हो पायेगी। शिक्षा के क्षेत्र में नीति शास्त्र का अभाव समाज को सही पृष्ठभुमि नहीं प्रदान कर पा रहा है।

यह हाल की घटना उसी श्रृंखला की एक नयी कड़ी है शायद जिसकी शुरू की कड़ियों में जेसिका लाल की हत्या, नीतिश कटारा की हत्या, बी एम डब्ल्यू केस आदि आते हैं। चार सौ व्यक्तियों के सामने खून होता है और अपराधी छुट जाता है। एक व्यक्ति नशे में धुत अपनी गाड़ी से छः पुलिस वालों को रौंद कर बेदाग निकल जाता है। सजु बाबा के लिये सिने दुनिया सहानुभूति प्रदर्शित्त करती है।

इन सामाजिक विषंगतियों से लड़ने के लिये हमें कई स्तरों पर युद्ध छेड़ना पड़ेगा।

1) पहला एव जड़ पर कुठाराघात करने के लिये एक समुचित शिक्षा का प्रयास। नीति शास्त्र को महत्व एव उसके लिये उचित पठन सामग्री यथा गीता को पाठ्य क्रम में स्थान।

2) कानून को समुचित आधार । इस के पीछे समाज के चतुर्थ स्तम्भ को खास भुमिका अदा करने की आवश्यकता है। जिस तरह प्रेस ने जेसिका लाल केस में सरकार को बाध्य कर केस का retrial करवा दिया इसी तरह जागरुक प्रेस गणतन्त्र में कानून एव व्यवस्था स्थापित करने के में एक अहं भुमिका अदा करने की क्षमता रखती है।

समाज जब कभी कानूनी अवस्थायें कमजोर हुई हैं तब तब समाज में अराजकता को बढ़ावा मिला है। हाल में प्रस्तावित पुलिस रिफार्म भी इस दिशा में क्रान्तिकारी साबित हो सकने की क्षमता रखते हैं।

Please read with Internet explorer. Any other explorer may render some problem. Besides this can be read at  http://kuldipgupta.blogspot.com/2007/12/news-and-views.html  or  http://www.scribd.com/doc/917052/News-and-its-Grammar     too.

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