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Sunday 20 July, 2008
 10:49 | 15/Apr/2007 |  0 Comment(s)
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Gandhi





गांधी

गांधी तेरे चर्खे पर

खद्दरधारी आज कात रहें हैं सोने के धागे

पहन जन सेवा का मुखौटा
रहते लूट खसोट मे सबसे आगे
राष्ट्र के तीनों स्तम्भ
गाँधी तेरे तीन बन्दरों की नाईं
आंख कान मुंह बन्द कर लाचार
रक्षक नेता कान बन्द कर तक्षक बन गये
करते राष्ट्रसेवा के नाम पर व्याभिचार।
राजघाट पर हर साल मगरम cछी आंसू बहाते
दो अक्टुबार को माला पहनाते
बाकी 363 दिन
तेरा नाम बेच बेच कर अर्थ कमाते
स्विस बैंकों में उसे जमा करा
मेरा भारत महान का नारा लगाते
तेरी गांधी टोपी तो आज ऊछल रही है बीच  बाजार ।
परिवार वाद के साये में
पहन तेरे नाम का मुखौटा
भूमन्डलीकरण  के नाम पर
रामराज्य के बदले, रोमराज्य का करते प्रचार ।

अधिकारी गण अहं से अन्धे हो गये
आंखें मीच  फरमान सुनाते
गणतन्त्र की होली जलाते
मन्त्रियों के तलवे सहलाते
अपनी प्रोन्नति और कुर्सी की जद्दोजहद में
क्यों सुने वे जनता की पुकार।

न्यायपालिका भी मुंह बन्द कर बैठी
अपने Ivory Tower में खुद ही बन्द
संविधान के अनुcछेद, ज्यों बन गये हों कारागार।

 आज जब सिर्फ तम है चतुर्दिक

इस तमस से हमें उबारने 
हे युगावतार  एकबार
तुम फिर से आओ

तेरी खादी का द्रौपदी सा

आज हो रहा है चीर हरण

कृष्ण सम परित्राणाम साधुनाम,

एकबार तुम फिर से आओ
भारत को बांटा दो टुकड़ों में अंग्रेजों ने
भारतीयों के सौ टुकड़े कर दिये
इन खद्दरधारी जांतपांत के रंगरेजों ने
तुम्हारे उत्तराधिकारियों
के हांलाकि कुल अनेक हो गये
इन सब खल कुलों के चिन्ह भले ही हों अलग अलग
लेकिन हैं ये सारे दुष्कृताम
इन सब के विनाशाय
एकबार तुम फिर से आओ
गांधी तेरा ईश सत्य था
और सत्याग्रह तेरी थाती
आज सत्य रह गया किताबों में
और ईश दुबके बैठे मन्दिर माही
अनाचार अब धर्म हो गया
अपने सत्य के धर्म संस्थापनार्थ
एक बार तुम फिर से आओ
हे कलियुग के युगावतार
एक बार तुम फिर से आओ।


 





Category: Poetry | Permalink