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 19:29 | 18/Jul/2008 | 1 Comment(s)
Sun and Me


मैं क्यों नहीं मान पाता हूं


कि सूर्योदय के बाद सूर्यास्त होता है


सोम के बाद मंगल होता


और आज के बाद कल होता


क्योंकि मैं जानता हूँ कि


सूर्य का न उदय होता है न अस्त


वो तो सिर्फ टंगा खड़ा है, एक खूंटे से ।


यह तो है पृथ्वी का घूमना,


और मेरी पृथ्वी बद्धता ।


जिससे सूरज कभी होता है


मेरी आँखों के सामने


और कभी मेरी पीठ के पीछे।


और बस इसीलिये मुझे कभी


सूर्योदय एवं सूर्यास्त का छलावा


रास ही नहीं आया।


कभी सोचता हूं कि


अगर मैं अपनी ही धूरी पर घूम जाउं


तो  सूर्योदय और सूर्यास्त की श्रृंखला


निश्चित ही गड़बड़ा जायेगी


और अगर मैं चलना शुरु कर दूं


पृथ्वी की दिशा के विपरीत


तो सूर्योदय  एवं सूर्यास्त की परंपरा ही शेष हो जयेगी


फिर न आज के बाद के कल होगा


न सोम के बाद मंगल


रह जायेगी निरन्तर मध्यान्ह की धूप


और चिरन्तन आज में जीता हुआ मैं


 


Why can’t I accept,


That as per tradition every sunset follows a sunrise


That every Tomorrow follows a today


That every Tuesday follows a Monday


Its because I know


That the tradition of Sunset and Sunrise is a hoax


That the Sun is stuck fixed in its groove


It’s the earth’s rotation


And my bondage with the earth


That makes me face Sun at times


And put it behind my back on others


And that’s the reason that I could never enjoy this illusion


Of sunset and sunrise


Sometimes I hear a voice from my inner self


That if I turn on my axis


The tradition of sunset and sunrise shall get badly disturbed


And again if I started walking


In the direction opposite to the Earth’s spin


It would put an end to all the traditions


Viz.,a Sunset following a Sunrise


And a Tuesday following a Monday


And that of a tomorrow following a today


And we shall have a perennial mid day Sun


And a ME living perennially in TODAY


 

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 09:59 | 28/Jun/2008 | 3 Comment(s)
The Proletariat/ मजदूर

बरगद का पेड़
( a poem written by me when i was 20 abt 34 years back)


 


बरगद का पेड़ तो बूढा ही पैदा हुआ था


वह सदा झुका रहा है


हथेलियां  जमीं पर टिकी रहीं


सूरज के ताप से झुलसता


ताउम्र चौपाये सा पीठ झुकाये खड़ा रहा


वह नासमझ समझता था कि


सूर्य की किरणें तो जीवनदायिनी हैं।


 


एक दिन हठात्


उसकी मुलाकात हुई


हकीम शफाखाना से


साथ में थी खोयी हुई जवानी


वापस दिलाने का वादा।


उसके वादे से आश्वस्त


जैसे ही हथेलियां जमीन से उठाईं


वह ह्हरहरा कर ढ़ेर हो गया।


वह भूल गया था कि


उसने तो जवानी कभी खोई ही नहीं थी


वह तो बुढ़ा ही पैदा हुआ था


वह यह भी नहीं जानता था कि


खुद हकीम भी सूरजमुखी ही  था


और माँ पृथ्वी


निःस्पन्द थी


क्योंकि बेटा कमाउं नहीं था

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 22:57 | 21/Jun/2008 | 3 Comment(s)
Why Islam does not need Raja Ram Mohan Rai

इस्लाम को राजा राम मोहन राय की कोई आवश्यकता नहीं है। क्यों?

क्योंकि फिटकरी रगड़ने से कैन्सर ठीक नहीं होता। उसके लिये शल्य चिकित्सा करनी पड़ती है।

हालंकि राजा राम मोहन राय उन्नीसवीं सदी के एक महान समाज सुधारक थे और

उन्होंने आज से तकरीबन दो सौ वर्ष पहले समाज में जिन सुधारों के लिये संघर्ष किया ,वह एक अत्यन्त क्रान्तिकारी कदम था।

लेकिन मुद्दे की बात यह है कि हिन्दुत्व तो  हमेशा से ही प्रगतिशील धर्म रहा है। अतएव हिन्दु समाज में परिवर्तन लाने के लिये राम मोहन राय जैसे एक सहज व्यक्ति का पदक्षेप ही काफी था।

लेकिन आज मुस्लिम समाज के सन्दर्भ में वही राजा राम मोहन राय अपने आपको सम्पूर्ण रुप से नकारा महसूस करेंगे । आज इस्लाम जिस दोराहे या चौराहे पर खड़ा है उसमें महज मरहम पट्टी नहीं आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।

ईंट दर ईंट जोड़ एक बिल्कुल नया इस्लाम रचने की आवश्यकता है। इसीलिये आज के संदर्भ मे राजा राम मोहन राय नहीं इस्लाम को कमाल अततुर्क या Galileo जैसे शल्य चिकित्सक की आवश्यकता है। कमाल अतातुर्क ने सारे संभावित सुधारों के पहले सैन्यब से सत्ता को अपने हाथों में लिया। हजरत मोहम्मद ने भी इस्लाम की नींव सत्ता और तलवार की मदद से ही रखी थी।  

आज इस्लाम को Galileo की Heliocentric theory की भांति एक Complete Paradigm shift की आवश्यकता है। सतीप्रथा जैसे कुछ मामूली सुधारों से स्थिति में विशेष परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती। इस्लाम के अनुयायियों  को समझना होगा कि समाज की धुरी पंथ या पुस्तक से परे मानव है।  

आज इस्लाम समाज जिस औषधि को जीवनदायी कह कर बांट रहा है वह सदियों पहले EXPIRE  हो चुकी है। Expired  औषधियां अक्सर जीवन दायिनी न होकर प्राणघातक सिद्ध होती रही हैं। जिहाद आतंक का पर्याय बन चुका है। विद्यामन्दिर के नाम पर मदरसों में क्या शिक्षा दी जा रही है यह हाल ही में पाकिस्तान में लाल मस्जिद में प्रमाणित हो चुका है। आज अगर कहीं पर राष्ट्रीय संविधान को  शरीयत के अधीन किया जा रहा है तो सिर्फ औषधि ही नहीं डाक्टर की काबिलियत या नीयत पर से भी विश्वास उठ जाता है।

किसी भी पंथ या धर्म के दो मुख्य आधार होते हैं । पहला वह मानवतावादी हो एव दूसरा वह औचित्य की कसौटी पर खरा उतरे। हांलांकि हिन्दुत्व तो एकात्म मानवतावादी या Integral Humanism की बात करता है। जहां मानव सृष्टि का मालिक नहीं वरन् Trustee मात्र रह जाता है।

इस्लाम का जन्म सातवीं सदी में हुआ था। बारहवीं सदी तक आते आते इज्तेहाद यानि विश्लेषण पर प्रतिबन्ध लग चुका था। आज भी अगर कोई प्रश्न करे कि नमाज दिन मे पांच बार क्यों, चार बार या छः बार क्यों नहीं तो उसे धर्म विरोधी या Blasphemous करार दिया जायेगा। कुरान में जो कुछ जज्ब है उसके विषय में कोई भी प्रश्न करना एक बड़ा दण्डनीय अपराध है।

जिहाद के विषय में अक्सर कई सफाईयां पेश की जाती हैं यथा ये अपने अन्दर के युद्ध का पर्याय है। या कभी कभी इसे गीता के धर्म युद्ध के समकक्ष माना जाता है।

जिहाद पूर्णतया वाह्य युद्ध का नाम है। अक्सर नारे के स्वरुप कहा जाता रहा है कि चुंकि इस्लाम खतरे में है तो इस्लामी शक्तियों का युद्ध या जिहाद के लिये प्रत्यक्ष आह्वान आवश्यक है। अन्दर के युद्ध के लिये किसी आह्वान की आवश्यकता नहीं होती।

गीता का धर्मयुद्ध धर्म के साथ युद्ध था,या धर्म की स्थापना के लिये भी युद्ध था। धर्म के साथ युद्ध से तात्पर्य होता है कि युद्ध के साधारण नियमों का पालन,यथा भागते हुये शत्रु पर वार नहीं करना आदि। धर्म की स्थापना का अर्थ so called  हिन्दु धर्म की स्थापना से परे सिर्फ औचित्य की स्थापना ही है। दुर्योधन का राज्य वापस नहीं करना द्युतक्रीड़ा की शर्तों की अवमानना था। तब क्षात्रधर्म या औचित्य की कसौटी पर युद्ध ही आवश्यक था।

इसमें किसी खास पंथ की स्थापना का कोई मुद्दा नहीं था।

आज आवश्यक है की इस्लामी शक्तियां एक नये सिरे से एक नये इस्लाम की संरचना करें। हाल ही में Bill Clinton ने कहा है कि अमेरीका में काफी कुछ गलत है लेकिन काफी कुछ सही भी है। और गलत कुछ इतना भी गलत नहीं है कि जो कुछ अमेरीका में अच्छा है उसकी मदद से उस गलत को ठीक नहीं किया जा सकता । इस्लामी शक्तियां अगर इमानदारी से इस्लाम की पुरी जद्दोजहद के साथ इज्तेहाद करें तो कोई कारण नहीं कि परिवर्तन असंभव है। लेकिन वैचारिक इमानदारी व पूर्ण विवेक आधारित इज्तेहाद पहला सोपान है इस प्रयास का।

इस्लाम को आवश्यकता है एक गैलीलियो की जो आध्यात्मिक टेलीस्कोप के माध्यम से इस्लामी शक्तियों को यह बता पाये कि सामाजिक सौरमंडल की धुरी मानवता है, इस्लाम नहीं। हिजाब या दाढ़ी में न तो दीन है, न ही ये इस सामाजिक सौरमंडल के कोई दिशासूचक नक्षत्र  हैं। महज वेश-भूषा या वाह्याडम्बर से किसी दिशा का ज्ञान नहीं होता।  

जो इस्लाम को नहीं मानते वे काफिर नहीं हैं। सिर्फ उनकी मान्यतायें अलग हैं।

आज के परिप्रेक्ष्य में इस्लाम के सन्दर्भ में कई प्रश्न सहज ही उठ खड़े हो रहे हैं। विश्व में तकरीबन् 57 इस्लामिक राष्ट्र हैं।

1)      अधिकांश आर्थिक रुप से सबसे पिछड़े हुये हैं।

2)      एक में भी गणतान्त्रिक सरकार नहीं है।

3)      शिक्षा के मामले में आर्थिक रुप से सम्पन्न इस्लामी राष्ट्र यथा सउदी अरब भी काफी पिछड़ा हुआ है।

4)      भारत में आठ सौ वर्षों के मुगलों के शासन के बाद भी भारत का मुस्लिम समाज अधिकांश क्षेत्रों में राष्ट्रीय औसत के लिहाज से काफी पिछड़ा हुआ है।

इस्लाम ने हमेशा अपने आपको एक वैश्विक विचार शक्ति या भूमन्डलीय मजहब के रुप मे प्रक्षेपित किया है। इस के बावजूद इस्लाम क्यों अपने ही अनुयायियों को सामाजिक न्याय दिला पाने अक्षम रहा है?  

आज सउदी अरब का Reformer Wahabism ,Pertro Dollars के मद में आतंक की भाषा बोलने लगा है। आज विश्व में अधिकांश आतंकवादी घटनाओं के पार्श्व में इस्लामी शक्तियों का हाथ पाया जा रहा है। कहीं किसी पुस्तक या कार्टुन के एवज में हत्या की धमकी और फतवा, कहीं वन्देमातरम के गाये जाने पर फतवा। इसे excusivism या अलगाववाद की संज्ञा दी जाती है।

आज इस्लाम समाज की प्रथम द्वितीय व दस तक की प्राथमिकता शिक्षा ही होनी चाहिये। आज की आधुनिक शिक्षा जहाँ मानवता वाद सब मजहबों से उपर हो। टैगौर के शब्दों में

“Where the head is held high  and mind is without fear, May my nation  awake”

खुली आंखें और दृढ संकल्प के साथ एक कमाल अतातुर्क, एक Galileo  की शीघ्रताशीघ्र आवश्यकता है ,इस्लाम को अपने आज के स्वरुप में नये रंग भरने के लिये।

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 16:18 | 15/Jun/2008 | 4 Comment(s)
Raj Thakres Mumbai

मैने कुछ समय पहले मुम्बई और राज ठाकरे पर एक ब्लाग लिखा था। कम से कम एक दर्जन मराठी भाषी व्यक्तियों ने मुझे निहायत भद्दी भाषा में चुनचुन कर गालियां दी हैं। जबकि एक पाठक ने लिखा था कि मैने बहुत शालीनता से अपने विचार व्यक्त किये हैं। अगर शालीनता से उठाये गये प्रश्नों का उत्तर गाली है, तो उन के पत्र delete करने के अलावा और कोई उत्तर मुझे नहीं सुझा। वे सब गाली देने वाले लोग अपनी पृष्ठभूमि का परिचय ही दे रहे हैं। अतएव वे सब प्रेषक महज दया के पात्र ही हैं।

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 22:55 | 7/Jun/2008 | 5 Comment(s)
Why there are no Raja Ram Mohun Rais in Islam:

 

Hinduism is riddled with several ills. One which has been most often held against is casteism. We have had Sati Pratha as a bane and several such other blots.

The invigorating thing is that there have been several saints or thinkers who have revolted against centuries of sacred beliefs, challenged them and got the same eradicated or at substantially curbed. Best thing is nearly all such saints were venerated and held in high esteem.

Obviously they did have to face resistance from the established system, yet they were seldom persecuted or hounded by established system such as church  in the case of Galileo or Darwin.

Most of them became famous and honourable in their life time alone. When in 8th Century Adi Shankaracharya spoke against blind faith and professed questioning Brahma himself, no one tried to hound him into silence. He was as much a revolutionary as Jesus Christ yet he was held sacred and  not crucified. For his questioning of  Brahma’s existence he could had been declared a heretic and hanged. No, he was able to establish FOUR  Peeths or four centres of excellence where people could go and study his concept of Vedantic Hinduism.

Yet Hinduism is portrayed as an obscurantist religion and Islam and Christianity egalitarian and youthful or modern religion.

Islam was founded about Fourteen Centuries back. It is certainly the latest version of an inspiration, which is the principal objective of a religion. Yet the society has changed a lot in last fifty years let aside Fourteen Hundred Years. Any dead institution or book should not be allowed to remain an authority upon human behavior for such a long period, unless open to reinterpretation, continuous subjected to intensive questioning, and suitable amendment. A stagnant society/Religion can not claim MODERNHOOD.

I have been wondering as to why there have been no Raja Ram  Mohan Rais in Islam. Why no Dayanand Saraswati.

The answer is that Hinduism is a progressive religion which has no qualms about admitting its mistakes and making amends. Sati pratha was wrong, society accepted law that no one can even worship any diety as Sati. The concept was declared Impious and the person who was responsible for obtaining such declaration was a Hindu alone.

While Gandhi was fighting against Casteism, he became a very respected figure. No  Hindu saints or thinkers issued any FATWA against him.   

A person like Charvak who refused to cognize God was accepted as a RISHI.

A Religion is nothing but a process of thought to inspire oneself to manifest his best self. An individual’s intellect is the only valid prism to refract the inspiration and define one’s Dharma. No dead institution can have privy over his consciousness.

Sadly Islam is a religion which has a central edict “Not to question”. No research’s permissible. Any fresh interpretation or diagnosis is beyond the permitted liberties. An unquestionable doctrine is nothing but a blindfold. No one ever has become a Reformer with blindfolded eyes.     

The Reformers or the people who tried to bring about change became Pariahs. The founder of Sufi sect was butchered mercilessly. Ahmediyas have been declared heretics and are subject to regular large scale assassination in Pakistan. Wahabis the so called reformers are speaking the language of terrorism.

Church hounded Galileo for his heliocentric theory. Charles Darwin was a persecuted man. The only incident of stoning of a saint in Hinduism was that of Charvak for his Godlessness. And he said not respecting opposite views would cause decline of ones religion. Ultimately he was declared a Rishi.

 

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 12:52 | 6/Jun/2008 | 0 Comment(s)
Twenty First Century and some important questions.

New Century-- Few Pertinent Questions

                          नई सदी कुछ सनातन प्रश्न

 

लेखक का मुख्य कर्तव्य प्रश्न करना है। अक्सर ये वही प्रश्न होते हैं, जो लोगों के मानस को पहले से ही झकझोरते रहते हैं। लेकिन आमतौर से लोग अपनी कमजोरियों से बद्ध इन प्रश्नों कों कभी पुछ्ते नहीं है। लेखक उन प्रश्नों के उत्तर सुझाता तो है, लेकिन उसके सारे उत्तर अधूरे ही होते हैं। उन अधूरे उत्तरों से पाठकों को कुछ आनन्द मिलता है तो कुछ झुंझलाहट भी होती है। यही झुंझलाहट पाठ्कों को अपने आप से प्रश्न पूछ्ने के लिए मजबूर कर देती है। लेखक का ध्येय भी, उत्तर देना नहीं है, वरन उत्तर ढुंढने की इच्छाशक्ति जगाना है। समुचित उत्तर कभी बाहर से नहीं आते उन्हें अपने अन्दर ही ढुंढुना पड़ता है। आजतक मानव इतिहास में सम्पूर्ण उत्तर तो सिर्फ  श्री क्रृष्ण ही दे पाये थे। आज मैं  भी पाठकों से कुछ प्रश्न पूछ्ने का दुःसाहस कर रहा हूँ।

1)      इक्कीसवीं सदी में धर्म की प्रासंगिकता क्या है ?

2)      क्या  an eye for an eye ही उचित न्याय है।

3)      क्या भगवान सिर्फ मन्दिर में ही बसते हैं।

इक्कीसवीं सदी में धर्म की प्रासंगिकता क्या है-  काफ़ी समय से तकरीबन पूरे विश्व में ritualistic religion की ही प्रमुखता रही थी। हांलाकि भारत में अपवाद स्वरुप  

वेदान्तिक या मानववादी विचारधारा कभी भी गौण नहीं हुई।लेकिन योरोप में भी विगत दो शताब्दियों से ह्युमानिस्म विचारधारा को काफ़ी सम्मान मिला है। थियोसोफिकल सोसायटी (अमेरिका) का भी मूल वाक्य है कि कोई भी धर्म ,सत्य से उँचा नहीं है। समाज में जब कभी कर्मकाण्ड (rituals) के प्रति आस्था कम हुई तव मानवतावाद नें अपनी जड़ें मजवूत की है।    

हमारे तथाकथित धर्मगुरुओं की एक वड़ी विड़म्बना रही है कि अक्सर या तो उन्होंने समाज से विमुख हो अपने आपको आश्रमों या कन्दराओं में कैद कर लिया है , या तुलसीदास की उक्ति समर्थ को नहीं दोष गुसाई को चरितार्थ करते हुए विजयी शक्तियों का साथ दिया है।

समाज से विमुख आश्रमवासी सन्त, भक्तिभाव भले ही जगा पायें किन्तु कर्मरहित हो अपनी सार्थकता खो देते हैं। कर्मयोग के सूत्र में ही भक्तियोग व ज्ञानयोग के माणिक 

पिरो एक ग्रहणीय माला बन सकती है। ये माणिक अलग अलग चाहे कितने भी  खुवसुरत दिखें लेकिन आभुषण  नहीं बन सकते।

इतिहास के अधिकांश नाजुक मोड़ों पर धर्मगुरुओं ने औचित्य को दर किनारे कर, समर्थ का साथ दिया है। स्पेन में गणतन्त्र की हत्या करने वाले जनरल फ़्रेंको

को चर्च ने उच्चस्तरीय सम्मान से नवाज़ा ,मुसोलिनि जैसे फासिस्ट को द्वितीय विश्व

युद्ध के पहले पोप ने स्वयम प्रभु  पुत्र का नाम दिया।

कहीं कहीं धर्मगुरुओं ने ग्रन्थों को विचारशीलता से अधिक महत्व दिया है। यह स्वार्थपरक एवम दिग्भ्रमित प्रकिया है।  मनुष्य एक बुद्धिशील अभिव्यक्ति है।

कुछ जानने की, कुछ नया समझने की इच्छा रखता है। एक छोटे बालक की अंकों के पहाड़े के प्रति जिज्ञासा किसी भी revealed truth से अधिक महत्वपूर्ण है,क्योंकि उसमें मनुष्यता का पहला परिचय, एक स्वतन्त्र सोच एक सहज जिज्ञासा छिपी है। आदि शंकराचार्य ने व्रह्म भाष्य लिखते वक्त पहला वाक्य लिखा, आओ व्रह्म के प्रति जिज्ञासा करें। जिज्ञासा से परे का धर्म इक्कीसवीं सदी मे अप्रसांगिक है।

       किसी भूखण्ड को राष्ट्र  बनने के लिये महज आर्थिक व राजनीतिक सामंजस्यता के परे एक वैचारिक एकरसता एवम सामन्वयिक चिन्तन की भी परम आवश्यकता है। भारत की विशाल आबादी की पृष्ठभुमि में अनेकता होते हुए भी विचारों एवम संस्कृति का आम सहज धरातल ही इस राष्ट्र को बाँधे हुए है।  

नीत्से स्वरुप ईश्वर की हत्या कर पाश्चात्य समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी जड़ों से उखड़ अधार-रहित हो गया है।

कार्ल युंग (मनोचिकित्सक) ने कहा है कि उसके वे सारे मरीज जिन्होंने क्रिश्चियनिटि की शë